
पटना।
बिहार की सियासत इन दिनों अपने चरम पर है। मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर राजधानी पटना से लेकर दिल्ली तक हलचल तेज है। इसी बीच नीतीश कुमार का दिल्ली पहुंचकर राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेना सियासी संकेतों को और गहरा कर गया है। इसे महज औपचारिकता नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक बदलाव की आहट के तौर पर देखा जा रहा है।

मुख्यमंत्री की रेस में सबसे मजबूत दावेदार के रूप में सम्राट चौधरी का नाम लगातार आगे चल रहा है। पार्टी उन्हें एक आक्रामक और प्रभावशाली ओबीसी चेहरे के तौर पर देख रही है, जो बड़े सामाजिक समीकरणों को साधने में सक्षम माने जाते हैं। वहीं नित्यानंद राय भी एक अहम नाम हैं, जिनकी केंद्रीय राजनीति में पकड़ और अमित शाह से नजदीकी उन्हें मजबूत दावेदार बनाती है।
इसके अलावा विजय कुमार सिन्हा, श्रेयसी सिंह और रेणु देवी जैसे नेताओं को भी अलग-अलग सामाजिक और राजनीतिक संतुलन के लिहाज से देखा जा रहा है। वहीं संगठन से जुड़े और अनुभवी चेहरों में डॉ. संजय जायसवाल, दिलीप कुमार जायसवाल और मंगल पांडेय जैसे नाम भी चर्चा में बने हुए हैं। जमीनी स्तर पर सक्रिय नेताओं में संजीव चौरसिया और जनक राम का नाम भी समीकरणों में जोड़ा जा रहा है।
इन तमाम दिग्गज नामों के बीच एक चेहरा ऐसा है, जिसकी चर्चा धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से बढ़ रही है—अभय गिरी।
कहा जा रहा है कि अभय गिरी की संगठनात्मक क्षमता और जमीनी पकड़ ने उन्हें भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की नजरों में खास बना दिया है। सूत्रों की मानें तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह की रणनीतिक सोच के अनुरूप ऐसे चेहरे की तलाश है, जो बिहार में सामाजिक समीकरणों को साधते हुए विकास की नई कहानी लिख सके। वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी संगठनात्मक रूप से मजबूत और जमीन से जुड़े नेता के पक्ष में माना जा रहा है।
अभय गिरी की छवि एक सादगीपूर्ण लेकिन बेहद प्रभावी संगठनकर्ता की रही है। मुजफ्फरपुर के कुढ़नी ब्लॉक से निकलकर उन्होंने भाजपा के अंदर अपनी अलग पहचान बनाई है। कई राज्यों में काम करने का अनुभव और जातीय समीकरणों की गहरी समझ उन्हें एक मजबूत दावेदार बनाती है।
हालांकि, एनडीए के अन्य सहयोगी दलों की भी अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं, जिससे तस्वीर अभी साफ नहीं है। लेकिन जिस तरह से अभय गिरी का नाम अचानक चर्चा में आया है, उसने सियासत में नई दिलचस्पी पैदा कर दी है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि सोशल मीडिया पर 14 अप्रैल से 17 अप्रैल के बीच सीएम चेहरे के ऐलान की चर्चाएं जोरों पर हैं। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन जिस तरह से दिल्ली में बैठकों का दौर चल रहा है, उससे साफ है कि फैसला ज्यादा दूर नहीं है।
अब बिहार की जनता की नजरें दिल्ली पर टिकी हैं—क्या कोई नया चेहरा सामने आएगा या फिर अनुभव को तरजीह दी जाएगी? फिलहाल, सस्पेंस बरकरार है, लेकिन सियासी पारा लगातार चढ़ता जा रहा है।
ब्यूरो रिपोर्ट
