
नई दिल्ली। UGC द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए नए Equity Regulations को लेकर देशभर के छात्रों और अभिभावकों में चिंता बढ़ती जा रही है। खासकर सवर्ण समाज के छात्रों का कहना है कि इन नियमों के तहत शिकायत दर्ज कराना तो आसान कर दिया गया है, लेकिन झूठी या गलत शिकायतों से छात्रों को बचाने के लिए कोई साफ़ और मजबूत व्यवस्था नजर नहीं आती।
जमीनी हकीकत यह है कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में अक्सर छोटी बातों पर विवाद हो जाते हैं। ऐसे में अगर किसी छात्र पर भेदभाव का आरोप लगा दिया जाए और निष्पक्ष जांच से पहले ही कार्रवाई शुरू हो जाए, तो उसका भविष्य—पढ़ाई, करियर और मानसिक स्वास्थ्य—गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है। कई अभिभावक यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या हर शिकायत सच मानी जाएगी? और अगर शिकायत झूठी निकली तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
छात्र संगठनों का कहना है कि पहले से ही SC/ST एक्ट को लेकर समाज में डर और भ्रम का माहौल है। अब अगर शिक्षा संस्थानों में भी बिना संतुलित सुरक्षा के ऐसे नियम लागू किए जाएंगे, तो छात्रों के बीच विश्वास की जगह भय पैदा होगा। यह स्थिति किसी भी समाज के लिए ठीक नहीं है।
UGC का उद्देश्य समानता और सम्मान सुनिश्चित करना है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि समानता तभी संभव है जब सभी छात्रों—चाहे वे किसी भी समाज से हों—को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी सुरक्षा मिले। सरकार से मांग की जा रही है कि नियमों में यह स्पष्ट किया जाए कि झूठी शिकायतों पर भी कार्रवाई होगी और बिना पूरी जांच के किसी छात्र को दोषी नहीं माना जाएगा।
देश का भविष्य छात्र हैं। उन्हें डर के माहौल में नहीं, बल्कि न्याय और विश्वास के वातावरण में पढ़ने का अधिकार है।
ब्यूरो रिपोर्ट
