
पटना। भीषण गर्मी और लगातार बढ़ती हीटवेव के बीच लू (हीट स्ट्रोक) से होने वाली मौतों को लेकर AIIMS पटना के वैज्ञानिकों ने बड़ा और अहम खुलासा किया है। अब पोस्टमॉर्टम के जरिए यह अधिक सटीक तरीके से पता लगाया जा सकेगा कि मौत वास्तव में लू से हुई है या नहीं।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) पटना के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया है कि हीट स्ट्रोक के दौरान मानव शरीर के तापमान को नियंत्रित करने वाला मस्तिष्क का एक विशेष हिस्सा—अग्र हाइपोथैलेमस—सबसे ज्यादा प्रभावित होता है। इसी हिस्से में होने वाली गंभीर संरचनात्मक क्षति मौत की मुख्य वजह बनती है।
“ए हाइपोथैलेमस सेंटर्ड पैथोजेनेसिस ऑफ हीट स्ट्रोक डेथ्स – ए पोस्टमॉर्टम बेस्ड ह्यूमेन स्टडी” शीर्षक से प्रकाशित यह शोध अंतरराष्ट्रीय जर्नल मेडिको लीगल जर्नल के नवीनतम अंक में शामिल किया गया है। यह अध्ययन वर्ष 2024 में पटना क्षेत्र में 48°C तक तापमान, 95% आर्द्रता और 5 से 8 घंटे तक भीषण गर्मी के संपर्क में आए मामलों के पोस्टमॉर्टम विश्लेषण पर आधारित है।
इस शोध को AIIMS पटना के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग ने एनाटॉमी और पैथोलॉजी विभागों के सहयोग से पूरा किया। अध्ययन के प्रमुख लेखक और फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. अशोक कुमार रस्तोगी ने बताया कि अब हाइपोथैलेमस में होने वाली क्षति को फोरेंसिक जांच में निर्णायक साक्ष्य माना जा सकेगा।
अब तक लू से मौत के मामलों में पोस्टमॉर्टम के बाद भी स्पष्ट कारण तय करना कठिन होता था, जिससे मुआवजा, बीमा और सरकारी सहायता जैसी प्रक्रियाएं प्रभावित होती थीं। लेकिन इस नई खोज के बाद डॉक्टर वैज्ञानिक आधार पर मृत्यु का सही कारण तय कर सकेंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा लाभ उन परिवारों को मिलेगा, जो अपने परिजनों की मौत के बाद न्याय, मुआवजा और बीमा दावों के लिए संघर्ष करते हैं। अब प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, तेज और मजबूत होगी।
भीषण गर्मी के इस दौर में AIIMS पटना का यह शोध सिर्फ वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि आम लोगों के लिए राहत और जागरूकता का बड़ा संदेश भी है।
अजीत कुमार की रिपोर्ट
