
आरा (भोजपुर)। बबुरा थाना क्षेत्र के बिशुनपुर गांव स्थित भागड़ नदी के छठ घाट पर बुधवार सुबह स्नान के दौरान दो युवकों की डूबने से मौत हो गई। इस हादसे से पूरे गांव में मातम छा गया। मृतकों की पहचान नागेंद्र पाठक के 18 वर्षीय पुत्र निशांत पाठक और नारायण प्रसाद के 18 वर्षीय पुत्र सागर कुमार के रूप में हुई है।
जानकारी के अनुसार, चैती छठ के दूसरे अर्घ्य के दौरान चार युवक नदी में स्नान कर रहे थे। इसी दौरान अचानक पैर फिसलने से सभी गहरे पानी में चले गए। किसी तरह चंद्रकेत पंडित और नंदकिशोर सिंह तैरकर बाहर निकल आए, लेकिन निशांत और सागर गहराई में डूब गए। घटना के बाद घाट पर अफरा-तफरी मच गई और चीख-पुकार गूंज उठी।
सूचना मिलते ही बबुरा थाना पुलिस मौके पर पहुंची और एसडीआरएफ तथा स्थानीय गोताखोरों की मदद से तलाश शुरू की गई। करीब साढ़े छह घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद दोनों युवकों के शव नदी से बरामद किए गए। पुलिस ने आवश्यक कागजी कार्रवाई के बाद शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और बाद में परिजनों को सौंप दिया।
बताया जा रहा है कि निशांत हाल ही में बनारस से उपशास्त्री की पढ़ाई पूरी कर घर लौटा था, जबकि सागर ने दो दिन पहले ही आईएसी परीक्षा अच्छे अंकों से पास की थी। दोनों अपने-अपने परिवार के इकलौते बेटे थे और तीन-तीन बहनों के बीच घर की सबसे बड़ी उम्मीद माने जाते थे। अचानक हुए इस हादसे ने खुशियों भरे माहौल को पल भर में मातम में बदल दिया।
घटना के बाद दोनों परिवारों में कोहराम मचा हुआ है। सागर की मां नीलम देवी और निशांत की मां सीमा देवी का रो-रोकर बुरा हाल है। पिता और परिजन भी गहरे सदमे में हैं। पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई है। स्थानीय जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता मौके पर पहुंचकर परिजनों को सांत्वना दे रहे हैं।
मां की सूनी गोद, बुझ गए घर के चिराग:
बिशुनपुर गांव में जहां चैती छठ की आस्था और उत्साह का माहौल था, वहीं इस हादसे के बाद सन्नाटा पसर गया है। जिन घरों में पूजा-अर्चना और खुशी का माहौल था, वहां अब चीख-पुकार गूंज रही है। दोनों युवक अपने परिवार की उम्मीदों के केंद्र थे। एक ओर निशांत के भविष्य को लेकर बड़े सपने देखे जा रहे थे, तो दूसरी ओर सागर की हालिया सफलता ने परिवार को खुशियों से भर दिया था। लेकिन एक पल में सब कुछ खत्म हो गया।
घटना के बाद से दोनों माताओं का रो-रोकर बुरा हाल है। कभी बेटे की तस्वीर सीने से लगाती हैं तो कभी बेहोश हो जाती हैं। पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे। गांव के लोग भी इस हादसे से स्तब्ध हैं और हर कोई यही कह रहा है कि काश उस वक्त कोई उन्हें बचा पाता।
छठ घाट, जहां आस्था का दीप जलता है, इस बार दो परिवारों के चिराग हमेशा के लिए बुझ गए। पूरे गांव में मातम पसरा है और हर दिल में एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या इन मासूम जिंदगियों को बचाया नहीं जा सकता था?
ब्यूरो रिपोर्ट अनील कुमार त्रिपाठी
