बिहटा।
चैती नवरात्र के पावन अवसर पर माँ वन देवी मंदिर में भक्ति और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। मंदिर परिसर इन दिनों पूरी तरह भक्तिमय वातावरण में डूबा हुआ है। माँ के दरबार में विशेष श्रृंगार किया गया है, जिसे देखने और माता के दर्शन करने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ रहा है।
सुबह होते ही मंदिर में घंटियों की गूंज, शंखनाद और “जय माता दी” के जयकारों से माहौल भक्तिमय हो जाता है। श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं और सच्चे मन से माँ के चरणों में शीश नवाते हैं। कई भक्त परिवार सहित यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं और अपनी मनोकामनाएं माँ के समक्ष रख रहे हैं।

माँ वन देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर मनोकामना शीघ्र पूरी होती है। यही वजह है कि वर्षभर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है, लेकिन चैती और अश्विन नवरात्र के दौरान यहां की रौनक और भी बढ़ जाती है।

मंदिर से जुड़ी एक खास परंपरा आज भी निभाई जाती है। बताया जाता है कि ‘पट बंद’ होने के बाद मंदिर परिसर के आसपास कोई नहीं रुकता। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और श्रद्धालु भी इसका पूरी श्रद्धा के साथ पालन करते हैं।
रविवार और मंगलवार को उमड़ती है अधिक भीड़
मंदिर के पुजारी हरिओम बाबा के अनुसार, प्रत्येक रविवार और मंगलवार को यहां विशेष भीड़ देखने को मिलती है। नवरात्र के दिनों में तो दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।

यहां पूजा की विधि भी बेहद सरल और श्रद्धा से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि नारियल, फल, एक मुट्ठी चावल, सुपारी और उड़हुल (गुड़हल) के फूल अर्पित करने से माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

इस मंदिर की एक और विशेषता यह है कि यहां माँ वन देवी, माँ कनखा देवी और भैरव बाबा मिट्टी से बने पिंड स्वरूप में विराजमान हैं। यह स्वरूप भक्तों की आस्था को और भी गहरा करता है और उन्हें आध्यात्मिक अनुभूति कराता है।
नवरात्र के इन पावन दिनों में माँ वन देवी का दरबार श्रद्धा, विश्वास और भक्ति का केंद्र बना हुआ है। हर भक्त के चेहरे पर एक अलग ही सुकून और विश्वास झलकता है—कि माँ के दरबार में उनकी हर मनोकामना जरूर पूरी होगी।

ब्यूरो रिपोर्ट