🕊️ “जब सुबह की शुरुआत चहचहाहट से होती थी… जब आंगन में फुदकती गौरैया घर का हिस्सा लगती थी… क्या वो दिन अब सिर्फ याद बनकर रह जाएंगे?”


फुलवारी शरीफ।
हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है, लेकिन सवाल आज भी वही है—क्या हम सच में इस नन्ही चिड़िया को बचा पा रहे हैं? शहरीकरण, प्रदूषण और बदलती जीवनशैली ने कभी हर आंगन की शान रही गौरैया को धीरे-धीरे हमसे दूर कर दिया है।
हालांकि, फुलवारी शरीफ में आज भी कुछ घर ऐसे हैं जहां गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा है। सैयद अहमद शरीफ उर्फ बाबू भाई का घर इसका जीता-जागता उदाहरण है। उनके पुश्तैनी मकान में आज भी गौरैयों की चहचहाहट गूंजती है। वे बताते हैं कि “गौरैया हमारे बेडरूम से लेकर किचन तक आती-जाती है, और उसकी आवाज से घर में जीवन बसता है।”

रानीपुर निवासी राम अयोध्या सिंह यादव भी इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनके घर में गौरैया को पहले दाना देने के बाद ही परिवार खाना खाता है। वे कहते हैं, “जब तक हम अपने हाथ से उसे दाना नहीं देते, वह खाना नहीं खाती—जैसे परिवार का सदस्य हो।”
स्थानीय निवासी सार्थक सिंह भी बताते हैं कि गौरैया उनकी जीवनशैली में रची-बसी है—राजगीर से दानापुर तक हर घर में इसका अपनापन रहा है।
विश्व गौरैया दिवस पर इन परिवारों ने युवाओं से अपील की है कि वे आगे आएं—घर में दाना-पानी रखें, कृत्रिम घोंसले बनाएं और पर्यावरण को सुरक्षित रखें।
क्योंकि गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे आंगन की रौनक और प्रकृति के संतुलन की अहम कड़ी है—आज बचाएंगे, तभी कल दिखेगी।

अजीत कुमार की रिपोर्ट